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वर्तमान भारत में जाति व्यवस्था: चुनौती और भविष्य की मजबूती

भारत का सामाजिक ढांचा सदियों से जाति‑आधारित पहचान पर आधारित रहा है। वैदिक या प्राचीन काल में यह अधिकतर वर्ग आधारित था, लेकिन मध्यकाल आते‑आते यह जाति आधारित हो गया, जो समय के साथ अत्यधिक घातक और विभाजनकारी होता गया। आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में समानता को सर्वोपरि माना गया है, लेकिन जातिगत विभाजन आज भी भारत की राजनीति, समाज और विकास की दिशा निर्धारित कर रहा है। इसका जीवंत उदाहरण है तत्कालीन बिहार चुनाव और वर्ष 2025 में केंद्र सरकार द्वारा आगामी जातिगत जनगणना की घोषणा — जो स्वतंत्रता के बाद पहली बार 1931 के बाद हो रही है। इससे संभावित रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण की मांग और संसाधनों के वितरण पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। हाल की घटनाएँ और वास्तविकता हाल ही की घटनाओं से स्पष्ट है कि जातिगत ढांचा समाज में किस तरह पैर पसार रहा है। उदाहरण के लिए, देश भर के OBC संगठनों ने नागपुर में 17 फरवरी 2026 को sit‑in protest आयोजित करने की घोषणा की। इस प्रदर्शन में उन्होंने जातिगत जनगणना के फ़ॉर्मेट में बदलाव, और UGC के नियमों में शामिल संभावित जातिगत भेदभाव पर चिंता जताई। इसमें शिक्षा, आरक्षण और स...

मतदाता दिवस 2026: "नागरिक केंद्र में" थीम को वास्तविकता में बदलने की चुनौतियाँ

 हर वर्ष 25 जनवरी को विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र देश भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। मतदान का अधिकार नागरिक की राजनीतिक स्वतंत्रता का सर्वोच्च अधिकार है। 2011 से गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला यह दिवस नए मतदाताओं को पहचान पत्र प्रदान करने और मतदाता सूची के शुद्धिकरण का उद्देश्य रखता है।  भारत निर्वाचन आयोग 1950 से ही इस विविधतापूर्ण देश में अपनी कर्मठता से दायित्व निभा रहा है।लोकतांत्रिक देशों में सत्ता पक्ष पर शासकीय संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप आम है, जो विश्वव्यापी समस्या है। इस वर्ष 2026 की थीम "भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में नागरिक" है। लेकिन हालिया घटनाक्रम इसे चुनौती देते हैं। बिहार चुनावों में एसआईआर (स्पेशल इंसेंटिव रिव्यू) पहल पर सवाल उठे। थीम के बजाय "प्रमाणित करो, तुम मतदाता हो" अधिक प्रासंगिक होती। प्रमाण मांगना गलत नहीं; रिकॉर्ड सुधारना आवश्यक है। पर सवाल है—क्या हमारा डेटाबेस मजबूत है? 2003 के एसआईआर के बाद की समस्याएं 2053 में दोहराई जा सकती हैं। निर्वाचन आयोग को सुनिश्चित करना होगा कि कोई नागरिक मताधिकार से वंचित न रहे।न...

बहुमत के नशे में जकड़ता गणतंत्र

 ☐  गणतंत्र दिवस, यानि कि आजाद भारत के स्वप्न का कानूनी जामा पहनाने का दिन। स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसर भारत की यात्रा का रूट मैप यानि कि भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को पूर्ण होकर अपना स्वरूप ले चुका था । जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था । संविधान सभा के कुल 299 सदस्य एवम 15 समितियां थी, जिन्होंने 2 वर्ष 11 माह 18 दिन तक लगातार चर्चा कर सर्व सम्मति से भारत का संविधान तैयार किया । किंतु आज जब हर स्थान पर संविधान के नाम पर एक विशेष को महत्व देकर, उन्ही को माल्यार्पण किया जाता है तो ये इन 298 महानुभावों का अपमान है । खैर ये तो छोड़ो क्योंकि ट्रेंड के नाम के साथ चलने की आदत जो है । भारतीय संविधान की नीव हर भूखे को खाना, हर तन को कपड़ा एवम हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार विकास करने का अधिकार प्रदान करने के पावन उद्देश्य से रखी गई थी । आपको जानकर आश्चर्य होगा की प्रत्येक विषय पर बड़ी गंभीर चर्चा कर हमारे सभी संविधान सभा के सदस्यों ने दूरदर्शी निर्णय लिए । साथ ही सभी निर्णय बहुमत नहीं आम सहमति के आधार पर लिए गए थे जो की आज के समय तो कल्पना से भी परे है ।  ☐  हमा...